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32 साल में 36 करोड़ खर्च, फिर भी खेत प्यासे:गंगा पंप नहर योजना ट्रायल में ही फेल; अब नए निर्माण की मांग – Ganga Pump Canal Scheme Fails Trial 36 Crore Spent Over 32 Years Goes Down The Drain As Farmers Demand Rebuild

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लखीसराय जिले के सूर्यगढ़ा प्रखंड स्थित हैवतगंज गंगा पंप नहर योजना 32 साल बाद भी किसानों के खेतों तक पानी नहीं पहुंचा सकी है। करीब 36.50 करोड़ रुपये खर्च होने के बावजूद योजना का अपेक्षित लाभ किसानों को नहीं मिला। वर्ष 2018 में 11.50 करोड़ रुपये से कराए गए जीर्णोद्धार के बाद ट्रायल में ही केनाल में रिसाव और टूटने की समस्या सामने आ गई थी। अगस्त 2022 में दोबारा टेस्टिंग के दौरान पानी हुसैना गांव के तीसरे आरडी तक पहुंचा, लेकिन इसके बाद फिर रिसाव शुरू हो गया। अब 23 सितंबर को जदयू नेताओं और स्थानीय प्रतिनिधियों ने उपमुख्यमंत्री सह जल संसाधन मंत्री विजय कुमार चौधरी से मिलकर योजना को नए सिरे से बनाने की मांग की है।

किसानों के खेतों तक गंगा का पानी पहुंचाने के लिए शुरू हुई थी योजना

किसानों के खेतों तक गंगा का पानी पहुंचाने के उद्देश्य से 16 अप्रैल 1994 को तत्कालीन मुख्यमंत्री लालू प्रसाद यादव ने हैवतगंज गंगा पंप नहर योजना की शुरुआत की थी। करीब नौ किलोमीटर लंबे केनाल से 3,500 हेक्टेयर कृषि भूमि की सिंचाई का लक्ष्य रखा गया था। योजना की मूल लागत करीब 25 करोड़ रुपये बताई जाती है। इसके बाद वर्ष 2018 में जीर्णोद्धार के लिए 11.50 करोड़ रुपये निर्धारित किए गए। इसमें 10 करोड़ रुपये केनाल की मरम्मत और 1.50 करोड़ रुपये मोटर-पंप के लिए थे। इस हिसाब से योजना पर करीब 36.50 करोड़ रुपये खर्च होने के बाद भी खेतों तक पानी नहीं पहुंच सका।

किसानों की आशंका ट्रायल में ही सही साबित हुई

वर्ष 2018 में जीर्णोद्धार के बाद पंप का ट्रायल किया गया। करीब आधे घंटे पानी छोड़े जाने के बाद ही केनाल में पानी के दबाव से रिसाव और टूटने की समस्या सामने आने लगी। किसानों ने मरम्मत के दौरान ही पुराने केनाल को नए सिरे से बनाने की मांग की थी, लेकिन मरम्मत के जरिए योजना को चालू करने का प्रयास किया गया, जो विफल रहा।

2022 में हुसैना तक पहुंचा पानी, फिर बंद करनी पड़ी आपूर्ति

अगस्त 2022 में दोबारा टेस्टिंग की गई। इस दौरान पानी हुसैना गांव के तीसरे आरडी तक पहुंचा, लेकिन केनाल में रिसाव शुरू होने के बाद आपूर्ति रोकनी पड़ी। इससे पहले बिजली आपूर्ति में फॉल्ट के कारण भी टेस्टिंग प्रभावित हुई थी। अधिकारियों के निरीक्षण और योजना को चालू करने के निर्देश के बावजूद इसके बाद भी किसानों को सिंचाई का पानी नहीं मिल सका।

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अधिकारी ने भी मानी निर्माण में तकनीकी खामी

सिंचाई विभाग के सहायक अभियंता कौशल कुमार के अनुसार, स्टीमेट के मुताबिक केनाल की संरचना जमीन की पर्याप्त खुदाई के बजाय मिट्टी भरकर तैयार की गई थी। कंक्रीट का पर्याप्त इस्तेमाल नहीं होने के कारण पानी के दबाव में समस्या उत्पन्न हुई। उन्होंने बताया कि केनाल का लेवल ही सही नहीं है। विभाग की ओर से स्थल का आकलन कर योजना को नए सिरे से निर्मित कराने की दिशा में पहल की जा रही है।

किसान बोले- खर्च की जांच हो

स्थानीय किसान मालिक यादव ने कहा कि केनाल की स्थिति देखकर किसानों ने पहले ही चेताया था कि सिर्फ मरम्मत से समस्या दूर नहीं होगी। उनका कहना है कि करोड़ों रुपये खर्च होने के बावजूद खेतों तक एक बूंद पानी नहीं पहुंचा। उन्होंने काम की गुणवत्ता और खर्च की जांच की मांग की। जदयू नेता प्रवीण कुमार पंकज ने कहा कि योजना से सूर्यगढ़ा क्षेत्र के दर्जनों गांवों के किसानों को लाभ मिलना था, लेकिन उन्हें वर्षों से सिर्फ आश्वासन मिल रहा है। उन्होंने जीर्णोद्धार में खर्च हुई राशि के उपयोग की जांच कराने और जिम्मेदारी तय करने की मांग की। जनसुराज पार्टी के प्रदेश सचिव अमित सागर ने कहा कि योजना की कॉलोनी के भवन जर्जर हो चुके हैं और परिसर का उपयोग तबेले के रूप में हो रहा है। उन्होंने कहा कि वर्षों से बंद पड़ी योजना की बदहाली पर विभाग को गंभीरता से कार्रवाई करनी चाहिए।

अब नए सिरे से निर्माण की मांग

23 सितंबर को जदयू प्रदेश सलाहकार समिति के सदस्य डॉ. सुनील कुमार सिन्हा सहित अन्य नेताओं और स्थानीय प्रतिनिधियों ने पटना में उपमुख्यमंत्री सह जल संसाधन मंत्री विजय कुमार चौधरी से मुलाकात की। प्रतिनिधिमंडल ने योजना की पूरी स्थिति बताते हुए पुराने केनाल की जगह नए सिरे से निर्माण कराने और इसे जल्द चालू कराने की मांग रखी। प्रतिनिधिमंडल के अनुसार, उपमुख्यमंत्री ने कहा कि फिलहाल बाढ़ का समय है। उन्होंने नवंबर-दिसंबर में दोबारा उन्हें इस मामले की याद दिलाने को कहा। साथ ही योजना को नए सिरे से स्वीकृति दिलाकर निर्माण और उसे चालू कराने की दिशा में पहल का आश्वासन दिया। अब किसानों की नजर नवंबर-दिसंबर में होने वाली अगली पहल पर है। तीन दशक से अधिक समय से अधूरी पड़ी योजना के सामने सबसे बड़ा सवाल यही है कि इस बार कागज और ट्रायल से आगे बढ़कर पानी खेतों तक कब पहुंचेगा।

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