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Bihpur Gyarahwin Sharif Ghousulwara Jalsa: भागलपुर जिले के बिहपुर स्थित ऐतिहासिक खानका-ए-आलिया कादिरिया फरीदिया मोहब्बतिया में ग्यारहवीं शरीफ के मुकद्दस मौके पर जश्न-ए-गौसुलवरा का एक दिवसीय विशाल जलसा आयोजित किया गया. इस अवसर पर पीरान-ए-पीर गौसुल आजम दस्तगीर (रजि.) यानी गौस-ए-पाक का सालाना उर्स-ए-पाक पूरी अकीदत और धूमधाम के साथ मनाया गया. उर्स-ए-पाक को लेकर पूरे खानकाह परिसर को आकर्षक लाइटों, झंडों और फूलों से सजाया गया था. दिनभर चले इस रूहानी जलसे में बिहपुर और आसपास के इलाकों से आए अकीदतमंदों की भारी भीड़ जुटी रही.
गौस-ए-पाक पैदाइशी वली थे, गरीबों और जरूरतमंदों की सेवा ही उनका सच्चा संदेश: सज्जादानशीं
इस ऐतिहासिक जलसे का आयोजन खानकाह के सज्जादानशीं हजरत अली कौनैन खां कादरी फरीदी की सरपरस्ती और नायब सज्जादानशीं हजरत मौलाना अली शब्बर खां फरीदी की सदारत में संपन्न हुआ. जलसे को संबोधित करते हुए सज्जादानशीं ने कहा कि गौस-ए-पाक पैदाइशी वली थे और अल्लाह ताला ने उन्हें पीरों का पीर बनाकर दुनिया में भेजा. जलसे में मुख्य वक्ता के रूप में मौजूद हजरत मौलाना अबूसालेह फरीदी और हजरत मौलाना इरफान आलम उरफी ने गौस-ए-पाक की हयात (जीवन) और उनकी तालीमात पर रोशनी डाली. उलेमाओं ने कहा कि गौस पाक ने पूरी जिंदगी गरीबों, बेसहारा और जरूरतमंदों की खिदमत में गुजार दी. वे हमेशा लंगर तकसीम करते थे और समाज को मोहब्बत व इंसानियत का पैगाम देते थे.
मदरसे के बच्चों ने पेश की नात-ए-पाक, शजरा ख्वानी और नियाज-फातिहा से माहौल हुआ रूहानी
जलसे के दौरान रूहानी माहौल उस समय और अधिक खुशनुमा हो गया जब हाफिज कारी अजहरउद्दीन, पंजतन फरीदी, फारूक, शाहिद आलम और मदरसा जामिया शाह मोहब्बतिया के मासूम बच्चों ने गौस-ए-पाक की शान में खूबसूरत नात और मनकबत पेश की. जलसे के समापन के बाद नायब सज्जादानशीं हजरत मौलाना अली शब्बर खां फरीदी ने सिलसिला-ए-शजरा पढ़ा. इसके बाद बारगाह-ए-इलाही में देश व दुनिया में अमन, चैन और भाईचारे के लिए दुआएं मांगी गईं. नियाज-फातिहा की रस्म पूरी होने के बाद वहां मौजूद सभी अकीदतमंदों के बीच तबर्रुक के रूप में शीरनी का वितरण किया गया.
बड़ी संख्या में पहुंचे जायरीन, खानकाह परिसर में उमड़ा अकीदतमंदों का सैलाब
उर्स-ए-पाक के मौके पर खानकाह परिसर में सुबह से ही जायरीन के पहुंचने का सिलसिला शुरू हो गया था, जो देर रात तक जारी रहा. कार्यक्रम को सफल बनाने में कर्रार खां फरीदी, रहबर खां, रहनुमा खां, रोहमा खां, बुशमस आजम, गुलाम पंजतन फरीदी, शहबाज, हमीद, गुलजार, केताबुल मुंशी और रकीम समेत बड़ी संख्या में स्थानीय समाजसेवियों व खिदमतगारों ने महत्वपूर्ण भूमिका निभाई. पूरे दिन खानकाह परिसर गौस-ए-पाक के जयकारों और दुआओं से सराबोर रहा.

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