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Kazibari Padampur Durga Temple Hasanganj: बिहार के कटिहार जिले में स्थित हसनगंज प्रखंड का काजीबारी पदमपुर सार्वजनिक दुर्गा मंदिर कुछ ऐसी ही दिव्य और प्रेरणादायक कहानी समेटे हुए है. पिछले करीब सौ वर्षों से यह ऐतिहासिक मंदिर न सिर्फ स्थानीय लोगों की धार्मिक चेतना का मुख्य आधार बना हुआ है, बल्कि यहां हर साल नवरात्रि पर उमड़ने वाला जनसैलाब इस बात का गवाह है कि एक सदी बीत जाने के बाद भी लोगों की श्रद्धा में तनिक भी कमी नहीं आई है.
फूस की झोपड़ी से शुरू हुआ था भक्ति का यह 100 साल पुराना ऐतिहासिक सफर
इस पावन मंदिर के इतिहास के पन्ने पलटें तो पता चलता है कि शुरुआती दौर में यहां की स्थिति बेहद साधारण थी. आज से लगभग एक सदी पहले स्थानीय ग्रामीणों ने एक छोटी सी फूस की झोपड़ी बनाकर मां दुर्गा की प्रतिमा स्थापित की थी और पूरी सादगी के साथ पूजा-अर्चना शुरू की थी. उस वक्त संसाधनों की भारी कमी थी, लेकिन ग्रामीणों का उत्साह और भक्ति भावना अद्वितीय थी.
जैसे-जैसे साल बीतते गए, मां दुर्गा के दरबार में आने वाले भक्तों की मन्नतें पूरी होने लगीं और मंदिर की ख्याति दूर-दूर तक फैल गई. श्रद्धालुओं की बढ़ती संख्या और गहरी आस्था को देखते हुए मंदिर कमेटी और स्थानीय ग्रामीणों ने मिलकर एक भव्य मंदिर निर्माण का संकल्प लिया, जो आज एक सुंदर और आकर्षक स्वरूप में सबके सामने खड़ा है.
सुबह की पहली किरण से लेकर ढलती शाम तक उमड़ रहा भक्तों का जनसैलाब
शारदीय नवरात्रि के पावन अवसर पर काजीबारी पदमपुर दुर्गा मंदिर परिसर में आस्था और भक्ति का अद्भुत नजारा देखने को मिल रहा है. सुबह की पहली किरण फूटते ही मंदिर परिसर में दूर-दूर से आने वाले श्रद्धालुओं का तांता लग जाता है. मां दुर्गा की आरती, शंखध्वनि और वैदिक मंत्रोचार से पूरा इलाका गुंजायमान हो रहा है.
वहीं शाम के वक्त मंदिर परिसर में विशेष चहल-पहल और आध्यात्मिक उत्सव जैसा माहौल बन जाता है. परिसर को रंग-बिरंगी रोशनी और सुंदर सजावट से सजाया गया है, जिसकी अलौकिक छटा देखते ही बनती है.
सामाजिक समरसता का प्रतीक और स्थानीय अर्थव्यवस्था पर सकारात्मक असर
काजीबारी पदमपुर का यह सार्वजनिक दुर्गा मंदिर केवल एक धार्मिक स्थल मात्र नहीं है, बल्कि यह क्षेत्र की सामाजिक समरसता और एकजुटता की एक मजबूत मिसाल है. मंदिर के विकास और पूजा आयोजनों में हर वर्ग और समाज के लोग बढ़-चढ़कर हिस्सा लेते हैं.
नवरात्रि के दौरान यहां लगने वाले मेले और उमड़ने वाली भीड़ से स्थानीय छोटे दुकानदारों, फल विक्रेताओं और पूजा सामग्री बेचने वाले गरीब परिवारों की आजीविका को भी बड़ा सहारा मिलता है. इस तरह यह वार्षिक अनुष्ठान ग्रामीण अर्थव्यवस्था को भी नई ऊर्जा प्रदान करता है.
पूजा समिति की सतर्कता और श्रद्धालुओं की सुविधा के पुख्ता इंतजाम
सौ साल पुरानी इस गौरवशाली परंपरा को पूरी श्रद्धा और भव्यता के साथ जीवंत रखने के लिए मंदिर कमेटी के सदस्य दिन-रात मेहनत कर रहे हैं. मेला कमेटी के अध्यक्ष रंजीत उरांव, सचिव मनोज उरांव, सदस्य सदानंद तिर्की, सुधीर कुमार शर्मा और सुशील कुमार शर्मा के साथ-साथ स्थानीय युवा मंदिर परिसर में साफ-सफाई, सुरक्षा और श्रद्धालुओं की सुगम आवाजाही सुनिश्चित करने में लगे हुए हैं.
मंदिर प्रशासन का प्रयास है कि दूर-दराज से आने वाले किसी भी श्रद्धालु को दर्शन-पूजन में परेशानी न हो. आने वाले दिनों में महाअष्टमी और महानवमी पर यहां श्रद्धालुओं की भीड़ और ज्यादा बढ़ने की संभावना है, जिसे देखते हुए सुरक्षा और प्रबंधन के पुख्ता इंतजाम किए जा रहे हैं.
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