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Kilkari Bhagalpur Visual Art Workshop: भागलपुर के बरारी स्थित बिहार बाल भवन किलकारी परिसर में शुक्रवार का दिन बच्चों की जन्मजात प्रतिभा को नई ऊंचाई देने के मामले में बेहद खास साबित हुआ. राज्य के कोने-कोने से आए कला शिक्षक जब एक मंच पर जुटे तो उनका एक ही सपना था कि बिहार के बच्चों के भीतर छिपी रचनात्मकता को सही आकार कैसे दिया जाए. बिहार बाल भवन किलकारी की ओर से आयोजित तीन दिवसीय दृश्य कला (विजुअल आर्ट) प्रशिक्षक प्रशिक्षण कार्यशाला के शुभारंभ के साथ ही पूरा बरारी परिसर कला के नए रंगों से सराबोर हो उठा. इस राज्यस्तरीय आयोजन में बिहार के सभी नौ प्रमंडलों की विभिन्न किलकारी शाखाओं से चित्रकला, मूर्तिकला और हस्तकला के प्रशिक्षकों ने भाग लिया.
मासूम बच्चों के मन में कल्पनाओं का समंदर होता है, लेकिन जब तक उन्हें सही मार्गदर्शन और तकनीक न मिले, तब तक वह कैनवास पर उभर नहीं पाता. इसी सोच को जमीनी हकीकत में बदलने और प्रदेश के बाल कलाकारों को आधुनिक कला विधाओं से जोड़ने के लिए इस वृहद प्रशिक्षण शिविर की नींव रखी गई है. 25 से 27 सितंबर तक चलने वाली इस तीन दिवसीय कार्यशाला का उद्देश्य न सिर्फ प्रशिक्षकों की अपनी रचनात्मक क्षमता का विकास करना है, बल्कि बच्चों तक कला-शिक्षण के नवीन और वैज्ञानिक तरीकों को पहुंचाना भी है.
दिग्गजों के मार्गदर्शन में शुरू हुआ प्रशिक्षण, कला की जटिलताओं को सरल बनाने पर जोर
इस महत्वाकांक्षी कार्यशाला का औपचारिक उद्घाटन और पहले दिन का प्रशिक्षण सत्र विजुअल आर्ट के प्रख्यात विशेषज्ञ सीताराम तथा राज्य मुख्यालय की कार्यक्रम पदाधिकारी-सह-प्रभारी अनीता ठाकुर के कुशल मार्गदर्शन में शुरू हुआ. सत्र के दौरान प्रमंडल कार्यक्रम समन्वयक रविभूषण मुकुल, साहिल राज और सुधीर कुमार ने भी सक्रिय भूमिका निभाते हुए प्रशिक्षण गतिविधियों में महत्वपूर्ण सहयोग दिया.
विशेषज्ञों ने प्रशिक्षकों के साथ संवाद करते हुए इस बात पर गहरा बल दिया कि कला केवल रेखाएं खींचना या रंग भरना नहीं है, बल्कि यह बच्चे की मानसिक और भावनात्मक अभिव्यक्ति का सबसे सशक्त माध्यम है. प्रशिक्षकों को यह सिखाया जा रहा है कि वे किस तरह बच्चों की उम्र, उनकी मानसिक क्षमता और समझ के अनुरूप कला की बारीकियों को बेहद सरल और रोचक तरीके से पेश कर सकते हैं ताकि बच्चा बिना किसी दबाव के अपनी कल्पना को रूप दे सके.
आकार, रेखा और बिंदु से होगी कलात्मक विकास की शुरुआत
प्रशिक्षण के पहले दिन बच्चों के बुनियादी कलात्मक विकास के तकनीकी पहलुओं पर विस्तार से चर्चा की गई. विशेषज्ञों ने प्रशिक्षकों को बताया कि जब कोई बच्चा पहली बार कागज पर पेंसिल चलाता है, तो वह सबसे पहले आकृतियों और रेखाओं को समझता है. कार्यशाला में विभिन्न प्रकार के आकार, आकृति, रेखा, चिह्न और बिंदु की सही पहचान कराने के तौर-तरीकों के बारे में व्यावहारिक जानकारी दी गई.
छोटे बच्चों के भीतर शुरुआती उम्र से ही कला के प्रति स्वाभाविक रुचि और गहरी समझ विकसित करने के उपायों पर मंथन हुआ. विशेषज्ञों का मानना है कि यदि बचपन में ही बच्चे को रेखाओं और आकारों का सही ज्ञान मिल जाए, तो आगे चलकर उसकी कलात्मक दृष्टि बेहद स्पष्ट और परिपक्व हो जाती है.
पेंसिल संचालन से लेकर शेडिंग और रंगों के संतुलित प्रयोग की मिली मास्टर क्लास
सत्र के दौरान प्रशिक्षकों को कई व्यावहारिक तकनीकों का अभ्यास कराया गया. इसमें बच्चों को पेंसिल पकड़ने और उसे सहजता से चलाने के सही तरीके, शेडिंग की बुनियादी व उन्नत तकनीकें तथा रंगों के संतुलित और रचनात्मक इस्तेमाल के बारे में विस्तार से बताया गया. प्रशिक्षकों को यह सिखाया गया कि इन तकनीकी बातों को बच्चों के सामने किसी कठिन पाठ की तरह नहीं, बल्कि खेल-खेल में और आनंददायक तरीके से कैसे प्रस्तुत किया जाए.
बिहार बाल भवन किलकारी भागलपुर के बरारी परिसर में आयोजित यह कार्यशाला 27 सितंबर तक चलेगी. इस प्रशिक्षण का सबसे सुखद और मानवीय पहलू यह है कि जब ये प्रशिक्षक अपने-अपने प्रमंडलों में लौटेंगे, तो राज्य के दूर-दराज के इलाकों में रहने वाले हजारों बच्चों को कला की राष्ट्रीय स्तर की बारीकियां सीखने को मिलेंगी. इससे बिहार के भावी चित्रकारों, मूर्तिकारों और हस्तशिल्पियों की एक नई और हुनरमंद पीढ़ी तैयार होगी.


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