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टीएमबीयू में एफओ के बंगले और चमचमाती कार पर बवाल! आरटीआई में मांगी गई पिछले 12 महीनों के पेट्रोल बिल की रिपोर्ट

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TMBU Finance Officer Staff Car News: बिहार के भागलपुर स्थित तिलकामांझी भागलपुर विश्वविद्यालय (टीएमबीयू) में वित्त पदाधिकारी (एफओ) के पद, उनके आधिकारिक आवास और लग्जरी स्टाफ कार के उपयोग पर गंभीर सवाल खड़े हो गए हैं. कागजी नियमों को ताक पर रखकर दी जा रही कथित सुविधाओं और विश्वविद्यालय के खजाने से हो रहे भुगतान का हिसाब मांगने के लिए अब एक सूचना का अधिकार (आरटीआई) कार्यकर्ता सामने आया है. नाथनगर निवासी संतोष कुमार श्रीवास्तव द्वारा मांगी गई जानकारी ने विश्वविद्यालय प्रशासन के गलियारों में हड़कंप मचा दिया है.

आरटीआई से खुला बड़ा मोर्चा: जानिए क्या है वीसी और प्रो-वीसी आवास से जुड़ा पूरा विवाद

इस पूरे घटनाक्रम की शुरुआत तब हुई जब विश्वविद्यालय के वित्तीय प्रबंधन और संसाधनों के आवंटन में भारी अनियमितताओं की चर्चाएं तेज होने लगीं. आरोप है कि विश्वविद्यालय में वित्त पदाधिकारी जैसे महत्वपूर्ण पद पर बैठे अधिकारी को उन सुविधाओं का लाभ दिया जा रहा है, जिनके वे नियमों के तहत हकदार हैं या नहीं, यह एक बड़ा रहस्य बना हुआ है.

नाथनगर निवासी संतोष कुमार श्रीवास्तव ने लोक सूचना पदाधिकारी तिलकामांझी भागलपुर विश्वविद्यालय को सूचना का अधिकार अधिनियम के तहत औपचारिक आवेदन सौंपकर चार प्रमुख बिंदुओं पर प्रमाणित प्रतियां मांगी हैं. सबसे बड़ा सवाल वित्त पदाधिकारी को दिए गए आधिकारिक आवास को लेकर उठाया गया है. आरटीआई में स्पष्ट रूप से पूछा गया है कि आखिर किस आदेश, नियम, परिनियम, अध्यादेश या विश्वविद्यालय के किस प्रस्ताव के आधार पर वित्त पदाधिकारी को प्रतिकुलपति (प्रो-वीसी) के आधिकारिक आवास में रहने की अनुमति दी गई है. इसके साथ ही आवास आवंटन से जुड़े मूल आदेश पत्र की प्रमाणित प्रति की भी मांग की गई है.

सरकारी स्टाफ कार और डीजल-पेट्रोल का खर्च: पिछले 12 महीनों के बिलों का मांगा गया ब्योरा

बात सिर्फ आलीशान बंगले तक ही सीमित नहीं है, बल्कि विश्वविद्यालय की आधिकारिक 'स्टाफ कार' के इस्तेमाल पर भी वित्तीय नियमों का उल्लंघन होने का संदेह जताया गया है. आवेदन में सक्षम प्राधिकारी द्वारा वित्त पदाधिकारी को वाहन उपयोग की अनुमति देने वाले आदेश की प्रति मांगी गई है.

आरटीआई में विश्वविद्यालय से यह साफ करने को कहा गया है कि टीएमबीयू के परिनियमों और कार्यालय आदेशों के तहत किन-किन अधिकारियों को स्टाफ कार की सुविधा दिए जाने का प्रावधान है. इसके साथ ही सबसे सनसनीखेज मांग पिछले 12 महीनों के दौरान स्टाफ कार में इस्तेमाल किए गए ईंधन यानी पेट्रोल और डीजल के खर्च से जुड़ी है. आवेदक ने पिछले एक साल में तेल पर हुए खर्च के तमाम बिलों, स्वीकृत बजट और भुगतान अभिलेखों की प्रमाणित कॉपियां मांगी हैं ताकि यह स्पष्ट हो सके कि विश्वविद्यालय के खजाने से कितना धन इस वाहन पर उड़ाया गया है.

नियुक्ति पत्र और कार्यकाल की वैधता पर संशय: जानिए वेतन-भत्तों से जुड़े वित्तीय राज

इस आरटीआई आवेदन का तीसरा सबसे महत्वपूर्ण और गंभीर पहलू वित्त पदाधिकारी की नियुक्ति की वैधानिकता से जुड़ा हुआ है. संतोष कुमार श्रीवास्तव ने विश्वविद्यालय प्रशासन से वर्तमान वित्त पदाधिकारी की नियुक्ति की सटीक तिथि और उनके नियुक्ति-पत्र या अधिसूचना की सत्यापित कॉपी मांगी है.

आवेदक का तर्क है कि विश्वविद्यालय प्रशासन को यह पारदर्शी तरीके से उजागर करना चाहिए कि एफओ पद के लिए कितना कार्यकाल निर्धारित था और वह कार्यकाल किस तारीख को समाप्त हो चुका है. इसके अलावा, वर्तमान में वित्त पदाधिकारी को दिए जा रहे वेतन, विभिन्न भत्तों और अन्य तमाम वित्तीय लाभों की पूरी सूची के साथ-साथ उनके भुगतान आदेशों की प्रतियां उपलब्ध कराने की मांग की गई है ताकि यह सिद्ध हो सके कि पद पर बने रहने और वित्तीय लाभ लेने में नियमों का पालन हो रहा है या नहीं.

TMBU Finance Officer Staff Car News: जानिए क्यों जरूरी है प्रशासनिक जवाबदेही

तिलकामांझी भागलपुर विश्वविद्यालय में अक्सर छात्रों को सत्र में देरी, मूलभूत सुविधाओं के अभाव और प्रशासनिक ढिलाई से जूझना पड़ता है. ऐसे माहौल में जब अधिकारियों के वाहन, ईंधन और आवास पर लाखों रुपये खर्च किए जाने का मामला उजागर होता है, तो इसका सीधा असर विश्वविद्यालय की साख और आम छात्रों पर पड़ता है.

स्थानीय निवासियों और छात्रों का मानना है कि जनता के टैक्स के पैसे से चलने वाले इस शैक्षणिक संस्थान में पूरी पारदर्शिता होनी चाहिए. अगर नियमपूर्वक सभी सुविधाएं दी जा रही हैं, तो विश्वविद्यालय प्रशासन को दस्तावेज सार्वजनिक करने में झिझक नहीं होनी चाहिए. फिलहाल आरटीआई आवेदन जमा होने के बाद विश्वविद्यालय के वित्त विभाग और प्रशासनिक महकमे में हड़कंप का माहौल है. अब देखना यह होगा कि लोक सूचना अधिकारी इन संवेदनशील सवालों पर कानून के मुताबिक समय सीमा के भीतर दस्तावेज उपलब्ध कराते हैं या मामला प्रथम अपील और राज्य सूचना आयोग तक पहुंचता है.

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